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सर्वसाफल्यदायी साधना

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सर्वसाफल्यदायी साधना
(पूज्य बापूजी की पावन अमृतवाणी)

इस बार चतुर्मास के निमित्त मैं एक ऐसी साधना लाया हूँ कि तुम केवल पाँच मिनट रात को सोते समय और पाँच मिनट सुबह उठते समय यह साधना करोगे तो जो भी तुम्हारी साधना है उसका प्रभाव सौ गुना हो जायेगा और छः महीने के अंदर तुम समाधि का प्रसाद पा सकते हो । ईश्वर की शरणागति का सामथ्र्य तुम्हारे जीवन में छलक सकता है । साक्षात्कार की मधुरता का स्वाद तुम ले सकते हो ।

क्या करना है कि रात को सोते समय पूर्व की तरफ अथवा तो दक्षिण की तरफ सिर करके सोयें । पश्चिम या उत्तर की तरफ सिर करके सोओगे तो qचता, बीमारी, विषाद पीछा नहीं छोडेंगे । सीधे लेट गये । फिर श्वास अंदर गया तो ‘ॐ', बाहर आया तो गिनती । फिर क्या करना है कि पैर के नख से लेकर शौच जाने की इन्द्रिय तक आपके शरीर का पृथ्वी का हिस्सा है, पृथ्वी तत्त्व है । शौच-इन्द्रिय से ऊपर पेशाब की इन्द्रिय के आसपास तक जलीय अंश की प्रधानता है और उससे ऊपर नाभि तक अग्नि देवता की, जठराग्नि की प्रधानता है । बाहर की अग्नि से यह विलक्षण है । नाभि से लेकर हृदय तक वायु देवता की प्रधानता है । इसलिए हृदय, मन वायु की नार्इं भागता रहता है और हृदय से लेकर कंठ तक आकाश तत्त्व की प्रधानता है ।

रात को जब सोयें तो पृथ्वी को जल में, जल को तेज में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में लीन करो । फिर लीन करनेवाला मन बचता है । फिर मन जहाँ से स्फुरित होता है, मन को अपने उस मूल स्थान ‘मैंङ्क में लीन करो - शांति... शांति... । जैसे सागर की तरंगें शांत करो तो शांत सागर है, ऐसे ही ‘शांति... शांति...ङ्क ऐसा करते-करते ईश्वरीय सागर में शांति का अभ्यास करते-करते आप सो गये । ‘सब परमात्मा में विलय हो गया, अब छः घंटे मेरे को कुछ भी नहीं करना है । पाँच भूत, एक शरीर को मैंने पाँच भूतों में समेटकर अपने-आपको परमात्मा में विलय कर लिया है । अब कोई चिंता नहीं, कुछ कर्तव्य नहीं, कुछ प्राप्तव्य नहीं है, आपाधापी नहीं, संकल्प नहीं । इस समय तो मैं भगवान में हूँ, भगवान मेरे हैं । मैं भगवान की शरण हूँ...' - ऐसा सोचोगे तो भगवान की शरणागति सिद्ध होगी अथवा तो चितन करो, ‘मेरा चित्त शांत हो रहा है । मैं शांत आत्मा हो रहा हूँ । इन पाँच भूतों की प्रक्रिया से गुजरते हुए, पाँच भूतों को जो सत्ता देता है उस सत्ता-स्वभाव में मैं शांत हो रहा हूँ ।' इससे समाधि प्राप्त हो जायेगी । अथवा तो ‘इन पाँचों भूतों को समेटते हुए मैं साक्षी ब्रह्म में विश्राम कर रहा हूँ ।ङ्क तो साक्षीभाव में आप जाग जायेंगे । अथवा तो ‘इन पाँचों को समेटकर सोऽहम्... मैं इन पाँचों भूतों से न्यारा हूँ, आकाश से भी व्यापक ब्रह्म हूँ ।'

ऐसा करके सोओगे तो यह साधना आपको पराकाष्ठा की पराकाष्ठा पर पहुँचा देगी । बिल्कुल सरल साधना है । १८० दिनों में एक दिन भी नागा न हो । शरणागति चाहिए, भगवद्भाव चाहिए, साक्षीभाव चाहिए अथवा ब्रह्मसाक्षात्कार चाहिए - सभीकी सिद्धि इससे होगी ।

रात को सोते समय यह करें और सुबह जब उठें तो कौन उठा ? जैसे रात को समेटा तो सुबह जाग्रत करिये । मन जगा, फिर आकाश में आया, आकाश का प्रभाव वायु में आया, वायु का प्रभाव अग्नि में, अग्नि का जल में, जल का पृथ्वी में और सारा व्यवहार चला । रात को समेटा और सुबह फिर जाग्रत किया, उतर आये । बहुत आसान साधना है और एकदम चमत्कारी फायदा देगी । सोते तो हो ही रोज और जागते भी हो । इसमें कोई विशेष परिश्रम नहीं है, विशेष कोई विधि नहीं है । केवल १८० दिनों में एक दिन भी नागा न हो; करना है, करना है, बस करना है और आराम से हो सकता है ।

आपकी नाभि जठराग्नि का केन्द्र है । अग्नि नीचे फैली रहती है और ऊपर लौ होती है । तो ध्यान-भजन के समय जठराग्नि की जगह पर त्रिकोण की भावना करो और qचतन करो, ‘इस प्रदीप्त जठराग्नि में मैं अविद्या को स्वाहा करता हूँ । जो मेरे और ईश्वर के बीच नासमझी है अथवा तो जो वस्तु पहले नहीं थी और बाद में नहीं रहेगी, उन अविद्यमान वस्तुओं को, अविद्यमान परिस्थितियों को सच्चा मनवाकर जो भटकान कराती है उस अविद्या को मैं जठराग्नि में स्वाहा करता हूँ : अविद्यां जुहोमि स्वाहा । अर्थात् नासमझी की मैंने आहुति दे दी ।
अविद्या का फल क्या होता है ? अस्मिता, देह को ‘मैं मानना । देह को ‘मैं मानते हैं तो अस्मिता का फल क्या होता है ? राग, जो मेरे हैं उनके प्रति झुकाव रहेगा और जो मेरे नहीं हैं उनको मैं शोषित करके इधर को लाऊँ । राग जीव को अपनी असलियत से गिराता है और द्वेष भी जीव को अपनी महानता से गिराता है । तो अस्मितां जुहोमि स्वाहा । ‘मैं अस्मिता को अर्पित करता हूँ । रागं जुहोमि स्वाहा । ‘मैं राग को अर्पित करता हूँ । द्वेषं जुहोमि स्वाहा । ‘द्वेष को भी मैं अर्पित करता हूँ । फिर आखिरी, पाँचवाँ विघ्न आता है, अभिनिवेश - मृत्यु का भय । मृत्यु का भय रखने से कोई मृत्यु से बचा हो यह मैंने आज तक नहीं देखा-सुना, अपितु ऐसा व्यक्ति जल्दी मरता है । अभिनिवेशं जुहोमि स्वाहा । ‘मृत्यु के भय को मैं स्वाहा करता हूँ ।

अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश - ये पाँच चीजें जीव को ईश्वर से अलग करती हैं । इन पाँचों को जठर में स्वाहा किया । शुरू में चाहे सात मिनट लगें, फिर पाँच लगेंगे, चार लगेंगे; कोई कठिन नहीं है ।
अगर सगुण भगवान को चाहते हो तो सगुण भगवान की शरणागति छः महीने में ही सिद्ध हो जायेगी । अगर समाधि चाहते हो तो छः महीने में समाधि सिद्ध हो जायेगीŸ। अगर निर्गुण, निराकार भगवान का साक्षात्कार चाहते हो तो भी छः महीने के अंदर सिद्ध हो जायेगा । इसमें कुछ पक‹डना नहीं, कुछ छोडना नहीं, कुछ व्रत नहीं, कुछ उपवास नहीं, बहुत ही युक्तियुक्त, कल्याणकारी साधना है । 


 


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  Comments

THANKS
Created by VED NIDHI KUMAR in 8/21/2013 10:56:37 PM
WHAT AN IDEA..................... ..........................
SADGURUDEV KE CHARNO ME BARMBAR PARNAM ..................................

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Created by kamal in 8/10/2013 9:28:13 AM
Hariom! Sadgurudev ki kripa baras rahi hai

hari om
Created by Rajni in 8/4/2013 4:11:30 PM
bahut uunchi sadhna hai
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Created by Gargi Gupta in 8/1/2013 11:22:20 AM
Jai ho gurudev
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Created by prakash in 7/31/2013 11:34:46 PM
hindi clear nahi hai
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Created by Pankaj Patel in 7/29/2013 4:15:20 PM
Guru Kripa hi kevlam...
HARIOM
Created by JOGENDRA in 7/25/2013 12:54:16 PM
KRUPALU GURU DEV KI JAY HO......................................
shat shat naman
Created by Ghanshyam sarva koradi nagpur maharastra india in 7/20/2013 9:42:28 PM
New Commentkoti koti vandan
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Created by Anonymous in 7/20/2013 3:51:45 PM
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Om Namo Bhagavate Vasudevaya !
Created by Pravin Patel ( U.S.A. ) in 7/10/2013 1:43:10 PM
Jay Gurudev ....
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