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अर्थ और महत्व
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अर्थ

दिव्यं जनानां यतो दद्यात ,कुर्यत पपस्या संक्षयं |
तस्मात्  दिक्सेती सा प्रोक्ता ,देसीकैस तत्त्व कोविदै: ||

आध्यात्मिक पुरुष जिन्होंने तत्व/ सत्य को जाना है द्वारा, वह विधि जो शिष्य को दिव्य ( अनुभवातित / अतिश्रेष्ठ ) ज्ञान देती है और पापों को नष्ट करती है , उसे दीक्षा कहते हैं ।

महत्व

- पूज्य बापूजी द्वारा वर्णित

दिव्य ज्ञान ( दीक्षा) जिसे मिलती है उसके  संचित पाप नष्ट  हो जाते हैं । दीक्षा से सांसारिक मोह ज्ञान का नाश होता है और धीर धीरे  आध्यात्मिक  ज्ञान  की तरफ बढ़ता है।
 
मंत्र दीक्षा के द्वारा गुरु शिष्य के सुप्त ज्ञान/शक्ति को जाग्रत करते हैं। दीक्षा २ अक्षरों -दी और क्ष से बना है।
`दी' का अर्थ है जो दी जाये या ऐसा मनुष्य जो दैविक ज्ञान से सुसज्जित कर सकता हो। `क्ष ' का अर्थ है जो पचा सके। एक तरफ गुरु का आशीर्वाद है जो भगवान के आशीर्वाद को देने में सक्षम हैं दूसरी तरफ आशीर्वाद को पचा सके ऐसा शिष्य है। दोनों के मिलन को दीक्षा कहते हैं । जब गुरु शिष्य को दीक्षा देते हैं तो अपने संवेदन शील सहज ज्ञान भी देते हैं और अपने संकल्प से भी सुसज्जित करते हैं ।
जब एक किसान खेत में बीज बोता है तो कोई बाहरी व्यक्ति नहीं बता सकता की बीज बोया है या नहीं । लेकिन जब बीज का सिंचन और प्रकाश मिलता है तो धीरे धीरे कोपले फूटती हैं और तभी कोई निशिचित रूप से कह सकता है की बीह बोया गया है । इसी तरह से हम अनभिज्ञ होते हैं कि मंत्र दीक्षा के समय हमारे अन्दर क्या बोया गया है । जब हम गुरु में पूर्ण श्रद्धा के साथ अध्यात्मिक क्रियाओं द्वारा सिंचन करते हैं तो हमारे अन्दर से गुरु का आशीर्वाद रूपी मंत्र प्रस्फुटित होता है और उसका प्रभाव देखा जा सकता है ।
एक माता को अपने गर्भ धारण का ज्ञान नहीं होत। इक महीने के बाद ही वह अनुभव कर पाती है या पता चल पता है । ३-४ महीने के बाद ही बाहर वालों को मालूम होता है के ये महिला गर्भवती है ।
दीक्षा तीन तरह की होती है - शाम्भवी दीक्षा, मंत्र दीक्षा और स्पर्श दीक्षा । शाम्भवी दीक्षा दृष्टि से दी जाती है जैसा-शुखदेव मुनि जी ने राजा परीक्षित को ७ दिन के श्रीमद भागवत कथा के ५वे दिन दी थी । स्पर्श दीक्षा स्पर्श कर दी जाती है । मंत्र दीक्षा मंत्र के द्वारा दी जाती है । गुरु की अध्यात्मिक शक्ति जितनी जाग्रत होगी उतना ही उसका प्रभाव होगा । अगर एक अज्ञानी मनुष्य किसी को `राम' नाम जपने को कहे तो उसका उतना प्रभाव नहीं होगा लेकिन वही `राम' नाम किसी सद्गुरु / भगवतप्राप्त गुरु के मुख से (जैसा की गुरु रामानन्दजी से कबीर को मिली) मिल जाये तो वह शक्तिशाली मंत्र हो जाता है ।
कबीरजी ने उस मंत्र को पूर्ण श्रद्धा और समर्पण से किया तो पूर्ण प्रतिष्ठित हो गए । मंत्र तो केवल वही शब्द `राम' था लेकिन गुरु भगवत तत्व् में जगे हुए थे ।
अगर एक साधारण कर्मचारी कुछ कहे तो उसकी बात में वजन नहीं होता । लेकिन वही बात प्रधान मंत्री के मुखे से आये तो उअसकी कीमत बहुत होती है । भगवत प्राप्त गुरु के मुख से मिले मंत्र को पूरे विश्वास और श्रद्धा से करने पर काफी उच्चाई प्राप्त हो सकती है ।
मंत्र=मनन (चिंतन) + अंतर ( ह्रदय में) ; वह जो ह्रदय में चमचमाये । दूसरे शब्दों में मंत्र =मन + तर, मंत्र वह होता है जिसका मनन करने पर मन को संसार से उपर उठा दे। मंत्र दीक्षा के समय मंत्र जितना छोटा होता है उसका जप उतने लय के साथ होता है और जापक के लिए उतना ही शुभ होता है । यह उस जापक को अध्यात्म के क्षेत्र में उतनी ही शीघ्रता से आगे बढाता है ।
नारदजी एक ऐसे संत थे जो किसी भी संप्रदाय या मत से जुड़े नहीं थे । उनका मुख्य उद्देश्य जो भी उनकी संगति में आये उसक भला करना होता था । वो संत जिनके ह्रदय में उनके पास आनेवाले सभी के मंगल का भाव होता है वे लोक संत कहे जाते हैं । जब नारदजी ने वालिया लुटेरे को दीक्षा दी तो `रा' का लम्बा उच्चारण और `म' का छोटा बताया और पहले 'म` फिर 'रा ` । वालिया की जीवनी शक्ति नीचे के केन्द्रों में थी । नारदजी अच्छे से जानते थे कि 'मरा ` का उच्चारण वालिया के उन केन्द्रों को स्पंदित कर ऊँचे केन्द्रों में स्थापित कर देगा बिना किसी समस्या के । उन्होंने वालिया को शाम्भवी दीक्षा भी दे दी जिससे उन्होंने अपनी शक्ति का भी संचार कर दिया उसमें । वालिया ने पूरी तत्परता से 'मरा ` का जप शुरू कर दिया । धीरे धीरे उसकी लयबद्ध जप से कुण्डलिनी जाग्रत हो गैगि और वह वालिया लुटेरे सेवाल्मीकि ऋषि बन गया ।
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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