Sant Shri
  Asharamji Ashram

     Official Website
 

Register

 

Login

Follow Us At      
40+ Years, Over 425 Ashrams, more than 1400 Samitis and 17000+ Balsanskars, 50+ Gurukuls. Millions of Sadhaks and Followers.

Audios
Live Tabs - Standard Edition - License Revoked!
Contact Us


Sadhana Tips for Aatma Sakshatkar
aatmasakshatkar_ttip3

4/27/2013 11:08:00 AM
aatmasakshatkar_ttip4

4/28/2013 9:38:00 AM
aatmasakshatkar_ttip2

4/27/2013 11:08:00 AM
aatmasakshatkar_ttip1

4/26/2013 1:08:00 PM

Articles List
चिदानंदरूपः शिवोऽहं शिवोऽहं...

  चिद्’ अर्थात् चैतन्य । ‘शिवोऽहम्’ अर्थात् कल्याणकारी आत्मस्वरूप मैं हूँ । दृढ़ भावना करो कि ‘मैं आत्मा हूँ... चैतन्यस्वरूप हूँ... आनंदस्वरूप हूँ.....
Read More..


सब दुःखों से सदा के लिए मुक्ति

  असंभव को संभव करने की बेवकूफी छोड़ देना चाहिये और जो संभव है उसको करने में लग जाना चाहिए । शरीर एवं संसार की वस्तुओं को सदा सँभाले रखना असंभव है अ...
Read More..


लक्ष्य सबका एक है...

जन्म का कारण है अज्ञान, वासना । संसार में सुख तो मिलता है क्षण भर का, लेकिन भविष्य अंधकारमय हो जाता है । जबकि भगवान के रास्ते चलने में शुरूआत में ...
Read More..


साधक सिद्ध कैसे बने ?

  साधारण से दिखनेवाले मनुष्य में इतनी शक्तियाँ छुपी हुई हैं कि वह हजारों जन्मों के कर्मबंधनों और पाप-तापों को काटकर अपने अजन्मा, अमर आत्मा में प्रत...
Read More..


परमात्मप्रेम में पाँच बातें

  परमात्मप्रेम बढ़ाने के लिये जीवन में निम्नलिखित पाँच बातें आ जायें ऐसा यत्न करना चाहिए : 1. भगवच्चरित्र का श्रवण करो । महापुरुषों के जीवन की गाथा...
Read More..


साधकों के लिये विशेष...

गुरु हमें गुरु-परंपरा से प्राप्त कई अनुभवों से सार-सार बातें बता रहे हैं । चाहे कैसी भी गंदी-पुरानी आदत होगी, त्रिबंध प्राणायाम से उसे आप उखाड़ फें...
Read More..


भगवान का अनुभव कैसे हो ?

  परमात्मा कैसा है ? आत्मा का स्वरूप क्या है ? कोई कहता है कि भगवान तो मोरमुकुटधारी हैं । कोई कहता है कि भगवान तो मर्यादापुरुषोत्तम हैं । कोई कहता ...
Read More..


आत्मज्ञान के प्रकाश से अँधेरी अविद्या को मिटाओ

  वसिष्ठजी महाराज कहते हैं : ‘‘ हे रामजी ! जिनको संसार में रहकर ही ईश्वर की प्राप्ति करनी हो, उन्हें चाहिए कि वे अपने समय के तीन भाग कर दें : आठ घं...
Read More..


Read Full Article
साधक सिद्ध कैसे बने ?

साधक सिद्ध कैसे बने ?

 

- पूज्य बापूजी की शिक्षाप्रद अमृतवाणी

साधारण से दिखनेवाले मनुष्य में इतनी शक्तियाँ छुपी हुई हैं कि वह हजारों जन्मों के कर्मबंधनों और पाप-तापों को काटकर अपने अजन्मा, अमर आत्मा में प्रतिष्ठित हो सकता है । मनुष्य तो क्या, यक्ष, गंधर्व, किन्नर एवं देवता भी उसका दर्शन पाकर तथा यशोगान करके अपना भाग्य बनाने लगें - ऐसा खजाना मनुष्य के भीतर छुपा हुआ है । महान् होने की इतनी सम्भावनाओं के रहते हुए भी मानव बहिर्मुख होने के कारण पशु की नाईं जीवन जीता है, व्यर्थ के तुच्छ भोग-विलास में ही अपना अमूल्य जीवन बिता देता है और अंत में अतृप्ति के कारण निराश होकर मर जाता है । व्यर्थ की चर्चा करने, बोलने, विचारने तथा मनोरथ गढ़ने में ही भोला मनुष्य अपनी आन्तरिक शक्तियों का ह्रास कर डालता है ।

...किन्तु साधक का जीवन संसारियों के जीवन से भिन्न होता है । संसारी लोगों की बातों में लोभ-मोह-अहंकार का पुट होता है लेकिन साधक के चित्त में निर्मलता, निर्मोहिता, निर्भीकता एवं निरहंकारिता की सुवास होती है । संसारी मनुष्य नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं का संग्रह करके इन्द्रियजन्य सुखों को भोगने को उत्सुक होता है जबकि साधक संसार के नश्वर सुख-भोग की वस्तुओं की अपेक्षा न करके अंतर्मुख होकर, आत्मानंद को पाने के महान् रास्ते पर चलता है । संसारी मनुष्य किसीकी निंदा-स्तुति करके तो किसीमें राग-द्वेष करके अपने चित्त को मलिनता की खाई में डालता है, जबकि साधक निंदा-स्तुति, मान-अपमान और राग-द्वेष को चित्त की वृत्तियों का खिलवाड़ समझकर अपने भीतर ही आत्मा में गोता मारने का प्रयास करता है । अपने स्वरूप को स्नेह करते-करते साधक निजानंद-स्वभाव में तृप्त होने को उत्सुक होता है जबकि निगुरा मनुष्य निजानंद-स्वभाव से बेखबर होकर विकारों के जाल में फँसा रहता है ।

इसीलिए उन्नति चाहनेवाले संयमी साधक को विकारी जीवन बितानेवाले संसारी लोगों से मिलने में घाटा-ही-घाटा है जबकि परमात्मप्राप्त महापुरुषों का सान्निध्य उसके जीवन में उत्साह और आनंद भरने में बड़ा सहायक सिद्ध होता है । सत्यस्वरूप परमात्मा में रमण करनेवाले उन आत्मारामी सत्पुरुषों के श्रीचरणों में जाकर साधक आत्मधन की संपत्ति हासिल कर सकता है लेकिन जब वह असावधानी से संसारियों एवं विकारियों के बीच में पड़ जाता है, उनके संपर्क में आने लगता है तो वह अपनी ध्यान और धारणा की शक्ति का ह्रास कर लेता है, आध्यात्मिक ऊँचाइयों से फिसल पड़ता है । अगर कोई साधक इस शक्ति का संचय करते हुए अपनी आत्मा में प्रतिष्ठित होने तक उसे सावधानी से सँभालकर रखे तो वह साधक देर-सबेर एक दिन सिद्ध हो ही जाता है ।
साधक के लिए एकांतवास, धारणा-ध्यान का अभ्यास, ईश्वरप्रीति, शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति - ये सभी अनिवार्य शर्तें हैं ।

एकांत में विचरण करना, कुछ दिनों के लिए एक कमरे में अकेले ही मौन रहकर धारणा-ध्यान का अभ्यास करना साधना में सफलता पाने के लिये परम लाभकारी है । वेदांत की बातें सुनकर भी जो एकांतवास तथा ध्यान-धारणा की अवहेलना करता है उसके पास केवल कोरी बातें ही रह जाती हैं लेकिन जिन्होंने वेदांत के वचनों को सुनकर एकांत में उनका मनन करते हुए निदिध्यासन की भूमिका हासिल की है वे साधक सिद्धि को प्राप्त हो जाते हैं ।
व्यर्थ का बोलना, सुनना एवं देखना साधक पसंद नहीं करता क्योंकि व्यर्थ का बोलने एवं जोर से बोलने से प्राणशक्ति, मनःशक्ति तथा एकाग्रता की शक्ति क्षीण होती है । व्यर्थ का देखने से चित्त में कुसंस्कार घुस जाते हैं और व्यर्थ का सुनने से चित्त मलिन हो जाता है । अतः उन्नति के चाहक को चाहिए कि वह व्यर्थ का देख-सुनकर अपनी शक्ति को क्षीण होने से बचाये ।

साधक उचित आहार-विहार से अपना सत्त्वगुण संजोये रखता है । सत्त्वगुण की रक्षा करना उसका परम कर्त्तव्य बन जाता है । उसे फिर ज्ञान बढ़ाने के लिए किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् सत्त्वगुण बढ़ते ही साधक में ज्ञान अपने-आप प्रगट होने लगता है ।

सत्त्वात्संजायते ज्ञानम्...

जैसे लोभी धन को सँभालता है, अहंकारी कुर्सी को सँभालता है, मोही कुटुम्बियों को सँभालता है ठीक ऐसे ही साधक अपने चित्त को चंचल, क्षीण एवं उग्र होने से बचाता है । जिन कारणों से चित्त में क्षोभ पैदा होता है, जिन कारणों से चिन्ता और भय बढ़ते हैं ऐसे क्रिया-कलापों से साधक सदैव सावधान रहता है । अगर इस प्रकार की परिस्थिति बलात् आ भी जाये तो साधक शांति से जप-ध्यान, शास्त्राध्ययन आदि का आश्रय लेकर विक्षेप उत्पन्न करनेवाले उन क्रिया-कलापों एवं विचारों से अपने को मुक्त कर लेता है ।

साधक को चाहिए कि वह अपने-आपका मित्र बन जाये । अगर साधक परमात्मप्राप्ति के लिए सजग रहकर आध्यात्मिक यात्रा करता रहता है तो वह अपने-आपका मित्र है और अगर वह अनात्म पदार्थों में, संसार के क्षणभंगुर भोगों में ही अपना समय बरबाद कर देता है तो वह अपने-आपका शत्रु हो जाता है ।
उच्च कोटि का साधक जानता है कि :

चातक मीन पतंग जब, पिया बिन ना रह पाय  ।
साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय ?

बुद्धिमान् साधक समझता है कि उसका लक्ष्य आत्मज्ञान पाना है और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए जीवन में थोड़ी-बहुत दृढ़ता जरूरी है । जो लोग दूसरों को खुश करने में, मित्रों को रिझाने में या वाहवाही में अपने लक्ष्य को ठोकर मार देते हैं, अपने परम कर्त्तव्य को भूल जाते हैं वे फिर कहीं के नहीं रहते । मित्र या कुटुम्बीजन हमारा जितना समय खराब करते हैं, उतना शत्रु भी नहीं करते । अतः बुद्धिमान् साधक इस विषय में बड़ा सावधान रहता है ताकि उसका अमूल्य समय कहीं व्यर्थ की बातों में ही नष्ट न हो जाये ।

इसलिये वह कभी-कभी मौनव्रत का अवलंबन ले लेता है जिससे उसकी जीवनशक्ति बिखरने से बच जाये । साधक मौन एवं एकांत-सेवन का जितना अधिक अवलंबन लेता है, उतनी ही उसकी दृढ़ता में बढ़ोतरी होती जाती है ।
हे साधक ! तू अपनी दृढ़ता बढ़ा, धारणा-शक्ति बढ़ा । तुझमें ईश्वर का असीम बल छुपा है । परमात्मा तुझमें ज्ञानरूप से प्रकट होने की प्रतीक्षा कर रहा है । तेरे भीतर विश्वनियंता अपने पूर्ण बल, तेज, ओज, आनंद और प्रेमसहित प्रकट होना चाहता है । अतः हे साधक ! तू सावधान रहना । कहीं संसार के कँटीले मार्गों में उलझ न जाना । जीवनदाता से मुलाकात किये बिना ही कहीं जीवन की शाम न ढल जाये । अतः सावधान रहना, भैया !
जब संसार स्वप्न जैसा लगे, तब आंतरिक सुख की शुरूआत होती है । जब संसार मिथ्या भासित होने लगे, उसका चिंतन न हो, तब अंतःकरण में शांति व आराम प्रगट होने लगते हैं । जब चित्त अपने चैतन्यस्वरूप परम स्वभाव में तल्लीन होने लगे, तब आंतरिक आनंद प्रगट होने लगता है ।

सारी मुसीबतें संसार को सत्य मानने एवं बहिर्मुख होने से ही आती हैं । अगर साधक अन्तर्मुख हो जाय तो उसे संसार स्वप्नवत् लगने लगे । अतः साधक को सदैव अन्तर्मुख होने का अभ्यास करना चाहिए । ऐसा करने से उसकी सारी व्याकुलताएँ, दुःख, शोक एवं चिन्ताएँ अपने आप गायब हो जायेंगी ।

जो समय हमें परमात्मा को जानने में लगाना चाहिए, ज्ञान पाने में लगाना चाहिए, अंतर्मुख होने में लगाना चाहिए वही समय हम संसार की तुच्छ वस्तुओं, भोगों एवं बहिर्मुखता में लगा देते हैं, इसीलिए ईश्वरप्राप्ति में विफल हो जाते हैं ।

संसार के प्रति आकर्षण का कारण है ईश्वर में श्रद्धा का अभाव एवं अंतर्मुख होने में लापरवाही । अगर साधक अंतर्मुख होता जाये तो उसका आत्मबल उत्तरोत्तर बढ़ता जाये और एक दिन उसके सारे दुःखों का अंत हो जाये । चाहे कैसा भी अपराध हो, बहुत बड़ा पाप हो, महापाप हो, यदि आत्मज्ञान की कुंजी मिल जाये, अंतर्मुख होने की कला आ जाये तो पाप में इतनी ताकत ही नहीं कि उसके आगे टिक सके ।

मौन, जप, उचित आहार-विहार, एकांत-सेवन एवं आत्मविचार अन्तर्मुखता लाने में अत्यंत सहायक सिद्ध होते हैं । जिन्होंने भी लोकसंपर्क से दूर रहकर अज्ञात स्थान में एकांतसेवन किया तथा अल्पाहार का आश्रय लिया, एकांत में रहकर ध्यान और योग के बल से अपनी जीवनशक्ति को विकसित करके जीवनदाता को, नित्यज्ञान, नित्यप्रेम और नित्य आत्मसुख को पाने का प्रयत्न किया, वे ही महापुरुष हो गये । लेकिन जिन्होंने लोकसंपर्क का सतत सेवन किया और लोकेश्वर के लिये अंतर्मुख होना स्वीकार नहीं किया, उनके पास केवल कोरी बातें ही रह गयीं । जिन्होंने भी मन की वृत्तियों को बहिर्मुख करके उन्हें कल्पनाओं की धारा में बहाया, उन्होंने वास्तव में अपनी जीवनशक्ति को क्षीण करने में ही समय गँवाया, अतः उनके जीवन में अँधेरा ही छाया रहा ।

मदालसा, गार्गी, याज्ञवल्क्य आदि विभूतियाँ एकांतसेवन तथा मौन का अवलंबन लेकर ही महान् बनीं । भगवान बुद्ध ने लगातार छः वर्ष तक जंगलों में अज्ञात रहकर कठोर साधना की और ध्यान-समाधि में तल्लीन रहे । आद्यशंकराचार्य के गुरु गोविन्दपादाचार्यजी भी नर्मदा तट पर स्थित ओंकारेश्वर में एक गुफा में सैकड़ों वर्षों तक समाधिस्थ रहे । आज तक जितने भी महापुरुष एवं महान् विभूतियाँ हुई हैं, उन्होंने अपने जीवन में मौन, एकांतसेवन, जप-ध्यान-धारणा एवं समाधि को ही महत्त्व दिया था । वे अपने निजस्वरूप में स्थित रहकर आत्ममस्ती में विचरते रहे ।

रमण महर्षि 53 वर्ष तक अरुणाचलम् में रहे । इस बीच उन्होंने अनेकों वर्ष एकांत में एवं योगाभ्यास में व्यतीत किये तथा समाधि में वे निमग्न रहे ।
उत्तरकाशी में कृष्णबोधआश्रम नामक महापुरुष ने अज्ञात व एकांतसेवन कर साधनामय जीवन बिताया और बड़े प्रसिद्ध हो गये ।
गंगोत्री में तपोवन स्वामी नामक एक विरक्त महात्मा ने गौमुख की बर्फीली पहाड़ियों पर जाकर एकांतसेवन करते हुए अपनी धारणाशक्ति को विकसित किया और आत्मचिंतन की धारा में मन की वृत्तियों को प्रवाहित कर ब्रह्माकार वृत्ति प्रगट की ।
श्रीरंग अवधूत महाराज ने लम्बे समय तक नर्मदा के किनारे अज्ञात रहकर एकांतसेवन किया तथा घास-फूस की कुटिया बनाकर वे ब्रह्माभ्यास को बढ़ाते रहे ।
श्री अरविंद घोष जैसे प्रसिद्ध व्यक्ति भी वर्षों तक एक कमरे में बंद रहे, अपने निवास से बाहर नहीं निकले । वे भी भारत के एक बड़े योगी के रूप में प्रसिद्ध हुए ।
निलेश स्वामी ने नेपाल के जंगलों में एकांतसेवन कर आत्ममस्ती का लाभ लिया ।
उत्तरकाशी और नैनीताल के भयानक अरण्यों में पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज भी वर्षों तक अज्ञात एकांत में आत्मयात्रा करते हुए, निजानंद की मस्ती लूटते हुए विचरते रहे । आत्ममस्ती से सराबोर वे दिव्य महापुरुष हजारों-लाखों लोगों के बिखरे हुए जीवन को सँवारने तथा साधकों के जीवन को जीवनदाता की ओर अग्रसर करने में समर्थ हुए ।

सभी संत महापुरुष एकांत के बड़े प्रेमी होते हैं । जिनको एकांत में परमात्मा का ध्यान करने की कला आ गयी, जिन्होंने एकाकी जीवन का मूल्य जाना है, वे व्यर्थ के सांसारिक झमेलों में पड़कर अपना आयुष्य बरबाद करना पसंद नहीं करते । ऐसे लोग व्यवहार में रहते हुए भी एकांत में जाने को उत्सुक रहते हैं । और तो सब देव हैं लेकिन शिवजी महादेव हैं । उन्हें भी जब देखो तब एकांत में समाधिस्थ रहते हैं ।
हम आये थे अकेले, जायेंगे अकेले । रात को भी तो अकेले ही रहते हैं । जब इन्द्रियाँ और मन शांत होकर निद्राधीन होते हैं तभी शरीर की थकान मिटती है । इसी प्रकार अगर समय रहते हुए आत्मध्यान में तल्लीन होना सीख लें तो सदियों की थकान मिट सकती है ।

उठो... कमर कसो । समय पल-पल करके बीता जा रहा है... मृत्यु नजदीक आ रही है । पुरुषार्थ करो । एकांतवास करो । धारणा-ध्यान का अभ्यास तथा शास्त्रविचार एवं महापुरुषों की संगति करो और उस परम सुखस्वरूप परमात्मा को पाकर मुक्त हो जाओ ।

 

 
 

View Details: 1718
print
rating
  Comments

New Comment
Created by veerkumarsaini in 6/13/2013 8:30:34 PM
New Comment

Realated Books

Hindi >>

Ishwar Ki Aur

Read Online

Download PDF

English >>

Towards The God

 

Shighra Ishwar Prapti

Read Online

 

Download PDF

 

 

jeete-ji-mukti.jpg

Jeete Ji Mukti

Read Online

Download PDF

 

 

 

Alakh Ki Aur

Read Online

Download PDF

Ananya Yog

Read Online

Download PDF

atamgunjan.JPG

Aatma Gunjan

Read Online

Download PDF

 

 

 

Shree Brahm Ramayan

Read Online

Download PDF

atamyog.JPG

Aatma Yog

Read Online

Download PDF

Daivi Sampada

Read Online

Download PDF

atamgunjan.JPG

Gyani Ki Gat Gyani Jaane

Read Online

Download PDF
 
Copyright © Shri Yoga Vedanta Ashram. All rights reserved. The Official website of Param Pujya Bapuji