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भवन का वास्तु


24 Sep 10

भवन का वास्तु

भवन में कमरों का निर्धारण वास्तु अनुसार निम्न प्रकार से किया जाना चाहिए।

अन्य निम्नांकित मुख्य बिन्दुओं पर भी ध्यान रखना चाहिएः

भवन यथासम्भव चारों ओर खुला स्थान छोड़कर बनाना चाहिए।

विदिशा भूखण्ड में विदिशा में भवन तथा मुख्य दिशावाले भूखण्ड में दिशा में ही भवन बनाना चाहिए। यथासंभव भवन की दिशा के समानान्तर होना चाहिए। पूर्व व उत्तर की चारदीवारी पश्चिम व दक्षिण के समानान्तर न हो तो भवन दक्षिण व पश्चिम की चारदीवारी के समानान्तर ही बनाना चाहिए। पुराने निर्माण में ऐसा न होने पर भवन की पश्चिम व दक्षिण की अतिरिक्त चारदीवारी बनाने से यह दोष ठीक हो  जाता है।

भवन के पूर्व एवं  उत्तर में अधिक तथा दक्षिण व पश्चिम में कम जगह छोड़ना चाहिए।

भवन की ऊँचाई दक्षिण एवं पश्चिम में अधिक होना चाहिए।

बहुमंजिला भवनों में छज्जाबालकनी, छत उत्तर एवं पूर्व की ओर छोड़ना चाहिए।

पूर्व एवं उत्तर की ओर अधिक खिड़कियाँ तथा दक्षिण एवं पश्चिम में कम खिड़कियाँ होना चाहिए।

नैऋत्य कोण का कमरा गृहस्वामी का होना चाहिए।

आग्नेय कोण में पाकशाला होना चाहिए।

ईशान कोण में पूजा का कमरा होना चाहिए।

स्नानगृह पूर्व की दिशा में होना चाहिए, यदि यहाँ संभव न हो तो आग्नेय या वायव्य कोण में होना चाहिए। परंतु  पूर्व के स्नानघर में शौचालय नहीं होना चाहिए। शौचालय दक्षिण अथवा पश्चिम में हो सकता है।

बरामदा पूर्व औरया उत्तर में होना चाहिए।

बरामदे की छत अन्य सामान्य छत से नीची होना चाहिए।

दक्षिण या पश्चिम में बरामदा नहीं होना चाहिए। अगर दक्षिण, पश्चिम में बरामदा आवश्यक हो तो उत्तर व पूर्व में उससे बड़ा, खुला व नीचा बरामदा होना चाहिए।

पोर्टिको की छत की ऊँचाई बरामदे की छत के बराबर या नीची होना चाहिए।

भवन के ऊपर की (ओवरहेड) पानी की टंकी मध्य पश्चिम या मध्यम पश्चिम से नैऋत्य के बीच कहीं भी होना चाहिए। मकान का नैऋत्य सबसे ऊँचा होना ही चाहिए।

घर का बाहर का छोटा मकान (आउट हाउस) आग्नेय या वायव्य कोण में बनाया जा सकता है परंतु वह उत्तरी या पूर्वी दीवाल को न छूये तथा उसकी ऊँचाई मुख्य भवन से नीची होना चाहिए।

कार की गैरेज भी आउट हाउस के समान हो परन्तु पोर्टिको ईशान में ही हो।

शौचकूप (सेप्टिक टैंक) केवल उत्तर मध्य या पूर्व मध्य में ही बनाना चाहिए।

पानी की भूतल से नीचे की टंकी ईशान कोण में होना चाहिए, परंतु ईशान से नैऋत्य को मिलाने वाले विकर्ण पर नहीं होना चाहिए। भूतल से ऊपर की टंकी ईशान में शुभ नहीं होती।

  
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