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गुरुपूर्णिमा एवं ‘ऋषि प्रसाद’ जयंती के निमित्त भव्य संत-सम्मेलन एवं सुप्रचार प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
गुरुपूर्णिमा एवं ‘ऋषि प्रसाद’ जयंती के निमित्त भव्य संत-सम्मेलन एवं सुप्रचार प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न

                      प्रेस-विज्ञप्ति

                                           दिनांक : 13-07-2014
 
गुरुपूर्णिमा एवं ‘ऋषि प्रसाद’ जयंती के निमित्त भव्य
संत-सम्मेलन एवं सुप्रचार प्रशिक्षण शिविर सम्पन्न
 
आध्यात्मिक ज्ञान, वैदिक संस्कृति तथा सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जीने की कला को अपने में सँजोयी हुई मासिक पत्रिका ‘ऋषि प्रसाद’ की 24वीं जयंती गुरुपूर्णिमा पर्व पर मनाई गयी। अहमदाबाद स्थित संत श्री आशारामजी आश्रम में इस निमित्त भव्य संत-सम्मेलन सम्पन्न हुआ। ‘ऋषि प्रसाद’ पत्रिका देश की सर्वाधिक संख्या में प्रकाशित होनेवाली आध्यात्मिक पत्रिका है। करोड़ों पाठकों की प्रिय यह मासिक पत्रिका 10 भाषाओं में प्रकाशित होती है तथा देश के सभी राज्यों में इसके पाठक मौजूद हैं। इस मासिक पत्रिका में प्रकाशित होनेवाले पूज्य बापूजी के सत्संग-प्रवचनों से एवं संतों-महापुरुषों, शास्त्रों के सारस्वरूप ज्ञान से नित्य नवीन प्रेरणा पाकर करोड़ों लोगों के जीवन में अद्भुत सकारात्मक परिवर्तन हुए हैं।
 
संत-सम्मेलन में पधारे संतों ने संस्कृति और सनातन धर्म पर हो रहे कुठाराघात की कड़ी निंदा की। पूज्य बापूजी पर झूठे आरोप थोप के जेल भेजे जाने की घटना को संतों ने देश एवं समाज के लिए एक बहुत बड़ी क्षति बताया। सभीका कहना था कि सत्य, संस्कृति तथा धर्म का प्रचार करनेवाली ‘ऋषि प्रसाद’ जैसी पत्रिकाओं की आज समाज को बहुत जरूरत है इसलिए ज्यादा-से-ज्यादा लोगों तक इसे पहुँचाना चाहिए।
 
सम्मेलन में आये ‘विश्व हिन्दू परिषद’ के केन्द्रीय मार्गदर्शक श्री लक्ष्मीनारायणजी दायमा ने कहा कि समाज का हर व्यक्ति सुखी, स्वस्थ और सम्मानित हो इस उद्देश्य से बापूजी ने इस पत्रिका की शुरुआत की थी। शिरडी के स्वामी साँईं किरण महाराज ने ‘ऋषि प्रसाद’ पत्रिका का महत्त्व बताते हुए कहा कि यह वेदों-पुराणों एवं अन्य दुर्लभ शास्त्रों का ज्ञान घर-घर तक पहुँचाती है। जिसके घर में ऋषि प्रसाद आती है, उसके घर में सुख-समृद्धि, शांति आने लगती है। आज कोई पेपर किसीको भेजने हों तो 25 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। केवल एक लिफाफा भी किसीको भेजना हो तो 5 रुपये लगते हैं लेकिन केवल 5 रुपये में यह पत्रिका छापकर घर-घर तक पहुँचाने की सेवा की जाती है। पिछले 10 सालों से महँगाई तो कई गुना बढ़ गयी लेकिन ऋषि प्रसाद पत्रिका उसी कीमत में समाज तक पहुँचायी जा रही है, यह बहुत ही प्रशंसनीय बात है।
 
मंडी, हिमाचल के संस्कृत दर्शनाचार्य श्री विकासानंदजी महाराज ने कहा कि 1990 में ऋषि प्रसाद का जब शुभारम्भ हुआ था, तबसे यह संतों के प्रसाद से, दिव्य संस्कारों और सत्संग से हमें निरंतर जोड़ती आयी है। इसमें बापूजी वेदांत का सत्संग सरल रूप में समझाते हैं।
 
सनातन संस्था, हिन्दू जनजागृति समिति के प्रतिनिधि श्री पंकज भाई रामी ने कहा कि हिन्दू धर्म की संत-परम्परा ने समाज को आदर्श दिया है। 24 साल से ‘ऋषि प्रसाद’ पत्रिका समाज को धर्मकार्य करने की प्रेरणा दे रही है, हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार कर रही है। श्री पंकज भाई ने हिन्दू संतों एवं संस्कृति के ऊपर जो प्रहार किये जा रहे हैं, उनका विस्तृत एवं तथ्यपूर्ण विवेचन कर उस पर उपाय-योजना के बारे में उत्तम मार्गदर्शन किया।
 
भागवत कथाकार श्री राजेन्द्रशास्त्रीजी महाराज ने संदेश दिया कि सनातन संस्कृति पर प्रहार हो रहे हैं। ‘ऋषि प्रसाद’ से सनातन संस्कृति की सेवा हो रही है। आनंद की प्राप्ति सद्गुरुप्रदत्त वस्तुओं से हो सकती है। संत श्री आशारामजी आश्रम की प्रवक्ता नीलम दुबे ने आश्रम से प्रकाशित होनेवाली मासिक डीवीडी मैगजीन ‘ऋषि दर्शन’ के बारे में बताते हुए कहा कि इसमें जीवन को उपयोगी अनेक तथ्यों पर प्रकाश डाला जाता है।
 
महेसाणा (गुज.) के महंत श्री रामगिरि बापू, मानसरोवर कैलाश के श्रीराम कथाकार राजेन्द्रस्वरूपजी महाराज आदि संतों ने भी वर्तमान समय में ऋषि प्रसाद पत्रिका की महत्ता बतायी।
 
धर्म-मार्ग में समाज को उन्नत करनेवाली तथा असत्य और अधर्म का प्रतिरोध करनेवाली ‘ऋषि प्रसाद’ जैसी पत्रिकाएँ समाज का सुयोग्य मार्गदर्शन करती हैं।
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Created by Anonymous in 7/14/2014 12:41:33 PMHari Om, Sadguru Deo Bhagwan ke charaon men koti-koti naman v charan sparsh. Yeh bahut hi achha avsar hai ki Pujya Shri dwara prerit 'Rishi Prasad' ki sankha dino-din badh rahi hai tatha yeh hamare samaj ko smaridhshali, sukhmai v sammannit banane ke liye ak bahut hi achhi patrika hai jo keval 6/- mei ghar bathe mil rahi hai.

SADHGURU BHAGWAN KI JAI HOH.
Created by BABUSINGH GOKULSINGH RAJPUT in 7/14/2014 10:52:59 AMRISHI PRASAD bapuji ki prasadi hein aur iski jarurat toh pranmatra ko hein joh bhi iseka adhyan karenga use apne jeevan mein samadhan avashya milenga.BAPUJI isme sanatan dharam ka divya dyan saral bhasha mein dete hein. RISHI PRASAD GHAR AA TI JAISE LAGTHA HEIN KI SWAYAM BAPUJI GHAR MEIN PADHAR RAHE HEIN. MERE BAPUJI NIRDOSH HEIN NIRDOSH HEIN NIRDOSH HEIN NIRDOSH HEIN AUR UNKI RIHAHI JALD SE JALD HOH. HARI OM HARI OM SADHGURU BHAGWAN KI JAI HOH.

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