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गुरु के पूजन का पर्व है गुरुपूनम - नवभारत टाइम्स

कोई आदरणीय होते हैं, कोई माननीय होते हैं, कोई वंदनीय होते हैं, कोई श्रद्धेय होते हैं, कोई प्रशंसनीय होते हैं किंतु सत्यस्वरूप में जगानेवाले, तीनों तापों से बचानेवाले साक्षात् परब्रह्म-परमात्म-स्वरूप तत्त्ववेत्ता भगवान व्यास तो पूजनीय हैं। 

फिर चाहे भगवान लीलाशाह के रूप में व्यास हों, चाहे मुनि शुकदेवजी के रूप में व्यास हों, चाहे परमहंस रामकृष्ण के रूप में व्यास हों... 

'व्यास' किसी व्यक्ति का नाम नहीं है। 'व्यास' उनको कहते हैं जो हमारे जीवन की बिखरी हुई धाराओं को सुव्यवस्थित करें, हमारे अंदर छुपे हुए खजाने को खोलने की कुंजी हमें बताएं। हमें उठाने की आध्यात्मिक व्यवस्था जो जानते हैं वे आध्यात्मिक अनुभव-संपन्न महापुरुष 'व्यास' हैं। 

ऐसे व्यासस्वरूप संतों के, सद्गुरुओं के पूजन का दिवस ही व्यासपूनम यानी गुरुपूनम है। 

गुरु तीन प्रकार के होते हैं: देवगुरु: जैसे देवर्षि नारद और बृहस्पति जी हैं... सिद्धगुरु: कभी-कभी किसी परम पवित्र, परम सात्विक व्यक्ति को मार्गदर्शन देते हैं। जैसे, गुरु दत्तात्रेय... मानवगुरु: हमारे बीच रहते हुए, हमारे जैसे लिखते-पढ़ते, खाते-पीते, लेते-देते, हँसते-रोते यात्रा करते हैं। पग-पग पर विघ्न-बाधाओं को सहते हुए और उनका निराकरण करते हुए यात्रा करते हैं। 

परम तत्त्व को पाए हुए वे मानवगुरु हमारे मन की सारी समस्याओं तथा हमारी बुद्धि की उलझनों को जानते हैं और उनके निराकरण की व्यवस्था को भी जानते हैं। यहाँ तक कि हम भी अपने मन को उतना नहीं जानते जितना मानवगुरु जानते हैं। 

देवगुरु को प्रणाम है, सिद्धगुरु को भी प्रणाम है, लेकिन मानवगुरु तो मानवजाति के परम हितैषी सिद्ध हुए हैं। उनको तो हम बार-बार प्रणाम करते हैं, उनका तो हम पूजन करते हैं। 

ऐसे सद्गुरु के प्रति श्रद्धा होना मानव-जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। जिसके जीवन में सद्गुरु के प्रति श्रद्धा नहीं है वह तो कंगाल है। चाहे उसके पास लाखों, करोड़ों, अरबों रुपये हों फिर भी वह कंगाल है। 

रावण के पास सोने की लंका थी, हिरण्यकश्यप का स्वर्ण का हिरण्यपुर था फिर भी हम उन्हें धनवान नहीं कहेंगे, कंगाल कहेंगे। जबकि श्रीराम परम धनवान थे क्योंकि त्रिभुवनपति होते हुए भी वे विश्वामित्रजी की पैरचंपी करते थे, गुरुवर वशिष्ठ जी के आश्रम में सेवा करते थे। धन्य थी श्रीराम की गुरुभक्ति! उनको मेरा बार-बार प्रणाम... 

गुरु के पूजन का दिन है गुरुपूनम। परंतु गुरुपूजा क्या है? गुरु बनने से पहले गुरु के जीवन में भी कई उतार-चढ़ाव आए होंगे, अनेक अनुकूलताएँ-प्रतिकूलताएँ आई होंगी, उनको सहते हुए भी वे साधना में रत रहे, 'स्व' में स्थित रहे, समता में स्थित रहे। वैसे ही हम भी उनके संकेतों को पाकर उनके आदर्शों पर चलने का, ईश्वर के रास्ते पर चलने का दृढ़ संकल्प करके तदनुसार आचरण करें तो यही बढ़िया गुरुपूजन होगा। 

हम भी अपने हृदय में गुरुतत्त्व को प्रकट करवाने के लिए तत्पर हो जाएं- यही बढ़िया गुरुपूजा होगी। जिनके जीवन में सद्गुरु का प्रकाश हुआ है वास्तव में उन्हीं का जीवन जीवन है, बाकी सब तो मर ही रहे हैं। मरनेवाले शरीर को जीवन मानकर मौत की तरफ घसीटे जा रहे हैं। 

धनभागी तो वे हैं जिनको जीते-जी जीवन्मुक्त सद्गुरु मिल गए। जिनको जीवन्मुक्त सद्गुरु का सान्निध्य मिल गया, आत्मारामी संतों का संग मिल गया, वे बड़भागी हैं। अष्टावक्र महाराज को पाकर जनक जी अपने आप को बड़भागी मानते हैं, वशिष्ठ जी को पाकर श्री रामचंद्र तथा गुरु सांदीपनि जी को पाकर श्रीकृष्ण-बलराम अपने को बड़भागी मानते हैं। गुरु गोविंदपादाचार्य को पाकर शंकराचार्य जी अपने को बड़भागी मानते हैं तथा शंकराचार्य जी को पाकर तोटक अपने को बड़भागी मानते हैं, श्री जनार्दन स्वामी को पाकर एकनाथ जी और एकनाथजी को पाकर पूरणपोड़ा अपने को बड़भागी मानते हैं तो श्री समर्थ को पाकर शिवाजी अपने को बड़भागी मानते हैं। 

ऐसे शिष्यों के पास चाहे ऐहिक सुख-सुविधाओं के ढेर हों, चाहे अनेकों प्रतिकूलताएँ हों फिर भी वे मोक्ष मार्ग पर जाते हैं। गुरु और शिष्य के बीच जो दैवी संबंध होता है उसे दुनियादार क्या जानें? सच्चे शिष्य सद्गुरु के चरणों में मिट जाते हैं और सच्चे सद्गुरु निगाहों से ही शिष्य के हृदय में बरस जाते हैं। 

गुरुपूर्णिमा का पर्व गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का पर्व है। शिष्य को गुरु से जो ज्ञान मिलता है वह शाश्वत होता है, उसके बदले में वह गुरु को क्या दे सकता है? 

लेकिन वह कहीं कृतघ्न न हो जाय इसलिए अपने सद्गुरुदेव का मानसिक पूजन करके गुरुपूनम के निमित्त गुरुचरणों में शीश नवाते हुए प्रार्थना करता है: 'गुरुदेव! हम आपको और तो क्या दे सकते हैं। इतनी प्रार्थना अवश्य करते हैं कि आप स्वस्थ और दीर्घजीवी हों। आपका ज्ञानधन बढ़ता रहे, आपका प्रेमधन बढ़ता रहे। हम जैसों का मंगल होता रहे और हम आपके दैवी कार्यों में भागीदार होते रहें'।



http://navbharattimes.indiatimes.com/astro/holy-discourse/A-day-of-Worshiping-the-Guru-Guru-Poornima/astroshow/21213392.cms

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SADGURUDEV KI JAY!
Created by Pranjal Joshi in 7/29/2013 1:06:36 PMSADGURUDEV KI JAY!

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