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जब चाहो तब राम-प्राकट्य

जब चाहो तब राम-प्राकट्य

 

पूज्य बापूजी की ज्ञानवर्धक, कल्याणकारी अमृतवाणी

श्रीराम नवमी  पर विशेष
जिस व्यक्ति के जीवन से, जिस समाज या राष्ट्र से ब्रह्मविद्यारूपी सीता माता विदाई लेती हैं वहाँ दुःख, बेचैनी, कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ आ जाती हैं। जब ब्रह्मविद्यारूपी माँ सीता को वापस लाने के लिए श्रीरामजी संकल्प करते हैं तो प्रकृति उनके अनुकूल हो जाती है। पत्थरों ने भी अपना वजन कम करके पुल का निर्माण किया। चंचल बंदर भी अनुशासित होकर युद्ध करने की योग्यता अपने में निखार लेते हैं। पठित-अपठित, रीछ और बंदर तो क्या, अरे, गिलहरियाँ भी श्रीरामजी के पक्ष में काम करके अपना भाग्य बना लेती हैं। हे मानव! तू भी अपने जीवन में उस ब्रह्मविद्या को ला, जिससे मुक्ति का अनुभव होता है, ‘सबमें एक और एक में सब’ के दर्शन हो जाते हैं।
जब आत्माराम की वे अर्द्धांगिनी ब्रह्मविद्यारूपी माँ सीता आ गयीं तो आत्माराम का राज्य अयोध्या नगरी में होने लगता है। तुम्हारे तनरूपी अयोध्या में, इस नौ द्वारवाली देह में दस इन्द्रियों में रत रहनेवाला यह जीव दशरथ है। इसकी तीन रानियाँ हैं - सात्त्विक वृत्ति कौसल्या, राजसी वृत्ति सुमित्रा और तामसी वृत्ति कैकेयी। यह जीव चाहता है कि मुझे आत्म-अमृत मिले, दशरथ चाहते हैं कि रामराज्य हो लेकिन तामसी वृत्ति के चक्कर में आकर वे राम को वनवास भेज देते हैं। परिणामस्वरूप दस इन्द्रियों में रमण करनेवाले जीव दशरथ की दुःखद दशा होती है। छटपटाकर यह जीव बेचारा मर जाता है, फिर जन्मता है और फिर मर जाता है।

अतः तुम आत्मविद्या को अपने जीवन में लाने का संकल्प करो। जिनके जीवन में अद्वैत व्यवहार, अद्वैत ज्ञान है उनके जीवन में सुख है, शांति है, माधुर्य है, प्रसन्नता है, सफलता है; प्रकृति हर कदम पर उनको सहायता पहुँचाती है। पर जिनके चित्त में अद्वैत की उपेक्षा है, देह को ही ‘मैं’ मानते हैं और देह के काम में आनेवाली वस्तुओं से चिपक जाते हैं उनको फिर कंस, रावण, हिटलर और सिकंदर की पंक्ति में रखकर प्रकृति परेशानी का अनुभव कराती है।

जीवनभर घोर शत्रुता रखनेवाला रावण भी मृत्यु के समय जिनकी प्रशंसा किये बिना नहीं रहता, शत्रु में भी गुण देखनेवाले, प्राणिमात्र के हितकारी भगवान श्रीरामजी का अवतरण-दिवस है राम नवमी। उन राम के स्वरूप को वही जानता है जिस पर वे प्रसन्न होते हैं। आप ऐसे कर्म और तड़प पैदा करो कि उनकी विशेष प्रसन्नता छलके। वे राम हमारे हृदय के अधिष्ठान हैं। जैसे हर तरंग का अधिष्ठान पानी है, ऐसे ही हर हृदय का आधार हृदयेश्वर है। उन सच्चिदानंद प्रभु को प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभु! आपके लिए प्यास पैदा हो जाय’ फिर तो तुम्हें बारह महीने में एक राम नवमी का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, जब गोता मारा तब राम नवमी, जब गोता मारा तब राम-प्राकट्य।

 

 

 
 

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