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संत की करें जो निंदा , उन्हें होना पडे शर्मिंदा

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संत की करें जो निंदा , उन्हें होना पडे शर्मिंदा
(संत तुलसीदासजी जयंती)

संत तुलसीदासजी काशी में प्रवचन करते थे । दूर-दूर तक उनकी ख्याति फैल चुकी थी । कहते हैं जहाँ गुलाब वहाँ काँटें, जहाँ चंदन वहाँ विषैले सर्प, ऐसे ही जहाँ सर्वसुहृद लोकसंत वहाँ निंदक -कुप्रचारकों का होना स्वाभाविक है । उसमें भी विधर्मियों की साजिश के तहत हमारे ही संतों के खिलाफ, संस्कृति व परम्पराओं के खिलाफ हमारे ही लोगों को भडकाने का कार्य अनेक सदियों से चलता आया है । काशी में तुलसीदासजी की बढती ख्याति देखकर साजिशों की शृंखला को बढाते हुए काशी के ही कुछ पंडितों को तुलसीदासजी के खिलाफ भडकाया गया । वहाँ कुप्रचारकों का एक टोला बन गया, जो नये-नये वाद-विवाद खडे करके गोस्वामीजी को नीचा दिखाने में लगा रहता था । परंतु जैसे-जैसे कुप्रचार बढता, अनजान लोग भी सच्चाई जानने के लिए सत्संग में आते और भक्ति के रस से पावन होकर जाते, जिससे संत का यश और बढता जाता था ।

अपनी सारी साजिशें विफल होती देख विधर्मियों ने कुप्रचारक पंडितों के उस टोले को ऐसा भडकाया कि उन दुर्बुद्धियों ने गोस्वामीजी को काशी छोडकर चले जाने के लिए विवश किया । प्रत्येक परिस्थिति में राम-तत्त्व का दर्शन व हरि-इच्छा की समीक्षा करनेवाले तुलसीदासजी काशी छोडकर चल दिये । जाते समय उन्होंने एक पत्र लिख के शिवमंदिर के अंदर रख दिया । उस पत्र में लिखा था कि ‘हे गौरीनाथ ! मैं आपके नगर में रहकर रामनाम जपता था और भिक्षा माँगकर खाता था । मेरा किसीसे कोई वैर-विरोध, राग-द्वेष नहीं है परंतु इस चल रहे वाद-विरोध में न पडकर मैं आपकी नगरी से जा रहा हूँ ।'

भगवान भोलेनाथ संत पर अत्याचार कैसे सह सकते थे ! संत के जाते ही शिवमंदिर के द्वार अपने-आप बंद हो गये । पंडितों ने एडी-चोटी का जोर लगा दिया पर द्वार न खुले । कुछ निंदक को के कारण पूरे समाज में बेचैनी-अशांति फैल गयी, सबके लिए संत-दर्शन व शिव-दर्शन दोनों दुर्लभ हो गये । आखिर लोगों ने भगवान शंकर से करुण प्रार्थना की । भोलेनाथ ने शिवमंदिर के प्रधान पुजारी को सपने में आदेश दिया : ‘‘पुजारी ! स्वरूपनिष्ठ संत मेरे ही प्रकट रूप होते हैं । तुलसीदासजी का अपमान कर निंदकों ने मेरा ही अपमान किया है । इसीलिए मंदिर के द्वार बंद हुए हैं । अगर मेरी प्रसन्नता चाहते हो तो उन्हें प्रसन्न कर काशी में वापस ले आओ वरना मंदिर के द्वार कभी नहीं खुलेंगे ।''

भगवान अपना अपमान तो सह लेते हैं परंतु संत का अपमान नहीं सह पाते । निंदक सुधर जायें तो ठीक वरना उन्हें प्रकृति के कोप का भाजन अवश्य बनना पडता है ।
अगले दिन प्रधान पुजारी ने सपने की बात पंडितों को कह सुनायी । समझदार पंडितों ने मिलकर संत की निंदा करनेवाले दुर्बुद्धियों को खूब लताडा और उन्हें साथ ले जाकर संत तुलसीदासजी से माफी मँगवायी । सभीने मिलकर गोस्वामीजी को काशी वापस लौटने की करुण प्रार्थना की । संतश्री के मन में तो पहले से ही कोई वैर न था, वे तो समता के ऊँचे सिंहासन पर आसीन थे । करुणहृदय तुलसीदासजी उन्हें क्षमा कर काशी वापस आ गये । शिवमंदिर के द्वार अपने-आप खुल गये । संत-दर्शन और भगवद्-दर्शन से सर्वत्र पुनः आनंद-उल्लास छा गया ।
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