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तुलसीदासजी के जीवन के प्रेरक प्रसंग

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तुलसीदासजी के जीवन के प्रेरक प्रसंग

भुलई नाम का एक  कलवार था । वह भक्ति-पथ और गोस्वामीजी की निन्दा किया करता था । उसकी  मृत्यु  हो  गयी  ।  सब  लोग  उसे  अर्थी  पर सुलाकर  श्मशान  ले  गये  ।  उसकी  स्त्री  रोती  हुई आयी,  उसने  गोस्वामीजी  को  प्रणाम  किया  । गोस्वामीजी  के  मुँह  से  सहज  में  निकल  गया  : ‘‘सौभाग्यवती होओ !'' जब उसने अपने पति की दशा बतलायी, तब तुलसीदासजी ने उसके शव को अपने पास मँगवा लिया और मुँह में चरणामृत देकर उसे जीवित कर दिया । उसी दिन से गोस्वामीजी ने नियम ले लिया और बाहर बैठना छोड दिया ।
तीन बालक बडे ही पुण्यात्मा थे । वे प्रतिदिन गोस्वामीजी के दर्शन के लिए आते । गोस्वामीजी उनका प्रेम पहचानते थे । वे केवल उन्हें ही दर्शन देने के लिए बाहर निकलते और फिर अन्दर बैठ जाते । जिन्हें दर्शन नहीं मिलता, वे इस बात से अप्रसन्न थे । निगुरे, मनमुख, हल्की मति-गति वाले ‘बाबा पक्षपाती हैं' ऐसा दोषदर्शन करने लगे । एक दिन गोस्वामीजी ने उनका महत्त्व सब लोगों के समक्ष प्रकट किया । उनके आने पर भी वे बाहर नहीं निकले । गोस्वामीजी का दर्शन न मिलने पर उन तीनों ने अपने शरीर त्याग दिये । गोस्वामीजी बाहर  निकले  और  सबके  सामने  भगवान  का चरणामृत पिलाकर उन्हें जीवनदान दिया ।
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संवत् १६६९ वैशाख शुक्ल में टोडरमलजी का देहान्त हुआ । उसके पाँच महीने बाद उनकी धन-सम्पत्ति उनके दोनों लडकों को गोस्वामीजी ने बाँट दी । इसके बाद छोटी-मोटी और कई रचनाएँ कीं । बाहु-पीडा होने पर गोस्वामीजी ने हनुमान-बाहुक  का  निर्माण  किया  ।  पहले  के  ग्रन्थों  को दुहराया, दूसरों से लिखवाया । संवत् १६७० बीतने पर जहाँगीर आया, वह बहुत-सी जमीन और धन देना चाहता था, परन्तु गोस्वामीजी ने नहीं लिया । एक दिन बीरबल की चर्चा हुई, उनकी बुद्धि और वाक्पटुता की प्रशंसा की गयी । गोस्वामीजी ने कहाः ‘‘खेद है कि इतनी बुद्धि पाकर भी उन्होंने भगवान का भजन नहीं किया ।''
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एक   दिन   अयोध्या   का   भंगी   आया   । गोस्वामीजी ने भगवान का स्वरूप समझकर अपने हृदय से लगा लिया । गिरनार के बहुत-से सिद्ध आकाश-मार्ग से आये । तुलसीदासजी का दर्शन करके बडे आनन्दित हुए । उन्होंने  बडे  प्रेम  से  पूछा  :  ‘‘तुम कलियुग में रहते हो फिर भी काम से प्रभावित नहीं होते, इसका क्या कारण है ? यह योग की शक्ति है अथवा  भक्ति  का  बल  है  ?'' गोस्वामीजी ने कहा : ‘‘मुझमें न भक्ति का बल है, न ज्ञान का बल है, न योग का बल है । मुझे तो केवल भगवान  के  नाम  का  भरोसा  है  ।'' गोस्वामीजी का उत्तर सुनकर वे सिद्ध बहुत प्रसन्न हुए । उनसे आज्ञा लेकर गिरनार चले गये ।
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गोस्वामीजी के पास चन्द्रमणि नाम का एक भाट आया । उसने उनके चरणों में गिरकर प्रार्थना की : ‘‘मेरी आधी उमर विषयों के भोग में ही बीत गयी । अब जो बची है, वह भी वैसे ही न बीत जाय । इन्द्रियों के  कारण मेरी बडी हँसी हुई । मेरे मन में काम-क्रोधादि बडे-बडे खल रहते हैं । कहीं अब भी वे न रह जायें । गोस्वामीजी महाराज ! अब मुझे भगवान के चरणों में ही रखिये ! काशी से दूर मत कीजिये ।'' गोस्वामीजी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । लेख पर मेख मारनेवाले इस महापुरुष ने बडी प्रसन्नता से कहा : ‘‘तुम हमेशा यहीं रहो और भगवान का गुणगान करो !''
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गोस्वामीजी के पास चन्द नाम का एक हत्यारा ब्राह्मण आया । दूर खडा होकर वह राम-राम कहने लगा । अपने इष्टदेव का नाम सुनकर तुलसीदासजी आनन्द-मग्न हो गये और उसके पास जाकर उसे हृदय से लगा लिया । आदर से भोजन कराया और बडी प्रसन्नता से कहा :
तुलसी जाके मुखनि ते, धोखेहु निकसत राम ।
ताके  पगकी  पगतरी,  मेरे  तन  को  चाम ।।
यह बात शीघ्र ही सारे नगर में फैल गयी । संध्या होते-होते बडे-बडे ज्ञानी, ध्यानी, विद्वान इकट्ठे हो गये । उन लोगों ने गोस्वामीजी से पूछा : ‘‘यह हत्यारा कैसे शुद्ध हो गया ?'' गोस्वामीजी ने कहा : ‘‘वेदों, पुराणों में नाम-महिमा लिखी है उसे पढकर देख लीजिये ।'' उन लोगों ने कहाः ‘‘लिखा तो है, परन्तु हमें विश्वास नहीं होता । आप कोई ऐसा उपाय करें  जिससे  हमें  विश्वास  हो जाय ।''  गोस्वामीजी  ने  उस हत्यारे के हाथों से भगवान शिव के नन्दी को भोजन कराया, यह देखकर सबको विश्वास हो गया । चारों  ओर  जय-जय  की  ध्वनि होने लगी । निन्दकों ने गोस्वामीजी के चरणों में  पडकर क्षमा माँगी ।
वह ब्राह्मण दिनभर गोस्वामीजी के स्थान पर बैठकर लोभवश राम-राम रटता । संध्या के समय श्रीहनुमानजी उसे धन दे देते थे । उसने भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए बडा हठ किया । गोस्वामीजी ने कहा : ‘‘पेड पर चढकर त्रिशूल पर कूद पडो, भगवान के दर्शन हो जायेंगे ।'' वह त्रिशूल गाडकर वृक्ष पर चढा परन्तु कूदने की हिम्मत नहीं हुई, नीचे उतर आया । एक घुडसवार उधर से जा रहा था, उसने सब बातें पूछ लीं और पेड पर चढकर त्रिशूल पर कूद पडा । उसे भगवान के दर्शन हो गये । हनुमानजी ने उसे तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया ।
अब गोस्वामीजी का अंतिम समय आ गया था । उन्होंने लोगों से कहा : ‘‘श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र का वर्णन करके अब मैं मौन होना चाहता हूँ । आप लोग तुलसीदास के मुख में अब तुलसी डालें ।'' संवत् १६८० श्रावण कृष्ण तृतीया, शनिवार को गंगा के तट पर काशी में अस्सी घाट पर गोस्वामीजी ने राम-राम कहते हुए अपने शरीर का परित्याग किया ।
इस प्रकार श्रीहनुमानजी की प्रेरणा और आज्ञा से तुलसीदासजी के रूप में पुनर्जन्म लेकर महर्षि वाल्मीकि ने भगवान राम के पवित्र चरित्र का लोगों में विस्तार किया । जिसके श्रवण से, कीर्तन से, स्मरण से लोगों को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है और सबसे बढकर भगवत्प्रेम की प्राप्ति होती है ।
गोस्वामीजी     अमर     हैं,     वे     अब     भी ‘श्रीरामचरितमानस'   के   रूप   में   लोगों   के   बीच विद्यमान हैं । अनन्त काल तक वे भक्तों-सज्जनों के बीच ही रहकर भक्तों-सज्जनों का कल्याण करेंगे । भक्त भगवान से पृथक नहीं होते । भक्त ही भगवान के मूर्तस्वरूप हैं, वे कृपा करके हमारे हृदय को शुद्ध करें और भगवान के चरणों में निष्कपट प्रेम दें ।
यह संक्षिप्त जीवनी गोसार्इंजी के समकालीन श्रीबेनीमाधवदासजी द्वारा रचित ‘मूल गोसार्इं-चरित' नामक पोथी के आधार पर लिखी गयी है ।


 


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