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9/16/2012 10:30:00 AM
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9/15/2012 2:13:00 PM
Detailed Article
प्रथम पूज्य गणेशजी


15 Sep 12

उपासक चाहे शैव हो या शाक्त, वैष्णव हो या सौर्य, सबसे पहले पूजन गणपतिजी का ही करते है | घर का वास्तुपूजन हो, दुकान का शुभारंभ होता हो या बही की शुरुआत हो, विद्याध्यन का प्रारंभ हो रहा हो, विवाह हो रहा हो या अन्य कोई मांगलिक कार्य हो रहा हो, सर्वप्रथम पूजन गणेशजी का ही किया जाता है |

लक्ष्मीवृद्धि की इच्छा रखनेवाले व्यापारी भी ‘श्री गणेशाय नम:|’ से ही बहीखाते का आरंभ करते है और उपासक भी ‘श्री गणेशाय नम:|’ करके ही उपासना शुरू करते है | योगी लोग भी सब मूलाधार केन्द्र का ध्यान करते है तो उसके अधिष्ठाता देव गणपतिजी का आराधन-आवाहन करते है |

उपनिषदों में गणेशजी की पूजा-आराधना सर्वोपरि मानी गयी है | उन्हें कारणब्रम्ह (अधिष्ठान) के रूप में और पूरा जगत कार्यब्रम्ह (अध्यस्त) के रूप में माना गया है | उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के भी अधिष्ठाता देव है गणपतिजी |

गणेश चतुर्थी अर्थात स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों को सत्ता देंनेवाले चैतन्यस्वरूप में विश्रांति पाकर, ‘सोऽहम्’ का नाद जगाकर,‘आनंदोंऽहम्’ का अमृतपान करके संसार-चक्र से मुक्त होने का दिवस |

भगवान सांब सदाशिव और माँ पार्वती, श्रीकृष्ण और राधाजी, श्रीराम और माता सीता, पुरुष और प्रकृति, ईश्वर और उसकी आह्रादिनी शक्ति-इनके रहस्यों को समझने के लिए कुंडलिनी शक्ति के, मूलाधार केन्द्र के अधिष्ठाता देव गणपतिजी माने जाते है |

जिसकी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होती है उसकी नाडियाँ शुद्ध होती है, शरीर में छुपे ही रोग दूर होते है, मन के विकार दूर होकर मन निर्मल होता है, बुद्धि सूक्ष्म व कुशाग्र होती है और परब्रम्ह परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है |

अपनी सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत करके तुरीयावस्था में पहुँचने का संकेत करनेवाले गणपतिजी गणों के नायक है | गण से क्या तात्पर्य है ? इन्द्रियाँ गण है | पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ व पाँच कर्मेन्द्रियाँ ये बहि:करण है और मन,बुद्धि,चित्त व अहंकार ये चार अंत:करण है | इन सबका जो स्वामी है वाही गणपति है, ज्ञानस्वरूप है |

ज्ञानस्वरूप, इन्द्रियों के स्वामी उन गणपतिजी से हम प्रार्थना करें कि ‘आपकी शक्ति,आपकी ऋद्धि-सिद्धि हमें संसार में न भटकाये, अपितु तुरीयावस्था में पहुँचाये ऐसी आप कृपा करना, देव !’    
 

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