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'आत्म -साक्षात्कार कठिन नहीं है .....'


11 Oct 12

'आत्म -साक्षात्कार कठिन नहीं है .....'

संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से
भगवान श्रीकृष्ण कहते है :
अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम: |
सर्व ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि ||

'यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करनेवाला है, तो भी तू ज्ञानरूप नौका द्वारा नि:संदेह संपूर्ण पाप-समुद्र से भलीभांति तर जायेगा |'
(श्रीमद भागवतगीता :४:३६ )
कोई अति पापी हो, महापापी हो किंतु यदि वह आत्मज्ञान पा ले तो तत्काल तर जाय |
लोगों ने आत्म-साक्षात्कार को कठिन मान लिया है | 'ज्ञान पाना मुश्किल है ..... असंभव है ..... हम तो पापी, दीन-हीन है .... हमारी क्या बिसात ? हम तो संसारी है .....
यह तो साधुओं का काम है ....' ऐसा सोचकर अपने को तुच्छ बना लिया है |
'अरे ! तुम आत्मा हो | निष्फिक्र, निश्चित एवं निर्भय होकर जियो | जो हो गया उसे सपना समझो | जो  हो रहा है वह भी सपना है | जो होगा वह भी एक दिन सपना हो जायेगा |
अपने को परमात्म-प्राप्ति के लिए अयोग्य मानना अथवा पापी मानना व दोषों से ऊपर न उठना ही बड़ा पाप है |
अपि चेदसि पापेभ्य .... चाहे कोई दुराचारियों में आखिरी नंबर के हों, फिर भी किये हुए पापों को फिर से न करना, की हुई भूल को फिर से न दोहराना, आर्तभाव से भगवान से प्रार्थना करना-उसका सब पापों से सदा के लिए पिंड छुड़ा देता है |

सच्चे ह्रदय की प्रर्थन भगवान सुनते है व मनोरथ पूरा करते है | अत: गिरे मत रहो, ऊपर उठो |
'आत्मशांति पाना,आत्मज्ञान पाना कठिन है |'
ऐसा कहनेवाले तो बहुत है परंतु आत्म-परमात्म प्राप्ति जिन्हें कठिन नहीं लगाती ऐसे महापुरुषों का मिलना कठिन है |
यदि ऐसे महापुरुष मिल जाए तो युद्ध के मैदान में भी ज्ञान हो सकता है | अर्जुन को ज्ञान की प्राप्ति युद्ध के मैदान में ही  हुई थी |
कबीरजी कहते है :
मन की मनसा मिट गयी, भरम गया सब दूर |
गगनमंडल में घर किया, काल रहा सिर कूट ||

आज तक जिन मान्यताओं को पाला-पोसा कि 'इतना मिलेगा तब सुखी होऊँगा .... इतना करूँगा तब सुखी होऊँगा .... यहाँ जाउँगा तब सुखी होऊँगा ...', उन मान्यताओं को मिटाकर चूर-चूर कर दो | अपने भूतकाल को याद कर-करके विचारों के जाल में कब तक फँसते रहोंगे ? मन की मान्यताओं में कब तक उलझते रहोंगे ? सब बंधनों को काटकर उठ खड़े हो, मुक्त हो जाओ | शरीर एवं मन के किले को छोड़कर आत्मा के आकाश में विहार करो | ऐसा ज्ञान पा लो कि तुम जीते -जी ही काल से परे हो जाओ और काल सिर कूटता रह जाय | ऐसा ज्ञान पाना कठिन नहीं है किंतु लोगों को अज्ञान को छोड़ने में, अपनी मान्यताओं को तोड़ने में कठिनाई लगाती है | अज्ञान और मान्यताओं में बहने की बेवकूफी सदियों की है अत: उसे छोड़ना कठिन लगता है, नही तो ईश्वर को पाने में क्या कठिनाई है ? ईश्वर तो अपना आत्मस्वरूप है |   
वशिष्ठजी कहते है : ' हे रामजी ! फूल की पंखुड़ी तोड़ने में परिश्रम है किंतु अपने आत्मस्वरूप को पाने में कोई परिश्रम नहीं |'
एक बार भी यदि वह ईश्वरीय सुख मिल जाय तो फिर किसी उपाय से जाता नहीं | संसार का सुख सदैव टिकता नहीं है और आत्मा का सुख कभी मिटता नहीं है | समाधि करो तो भी वह परम सुख नहीं जाता, भोजन करो तो भी नहीं जाता, सो जाओ तो भी नहीं जाता | अरे ! युद्ध करो तो भी नहीं जाता |
संसार की चीजों से सुख पाने के लिए परिश्रम करना पड़ता है | जड़ चीजों से थोडा सुखाभास तो होता है लेकिन अंत में दुःख, शोक और वियोग ही हाथ लगता है | ऐसा कोई सुखभोग नहीं है, जिसके पीछे दुःख, भय और रोग न हो | तुम जड़ चीजों से प्रेम करोगे तो वे चीजें तुम्हे प्रेम नहीं करेगी | तुम जेवर, कपड़ा , पैसा, गाडी-मोटर आदि वस्तुओं को चाहते हो लेकिन वे जड़ वस्तुएं वस्तुएँ तुम्हे नहीं चाहती | यदि ईश्वर को चाहते हो तो वह तुम्हे सत्प्रेरणा देता है | तुम्हारी चाह तीव्र और सच्ची होने पर अपने-आप मिलने की प्रेरणा देता है, प्रकटाने का रास्ता दिखाता है |

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